नोंक-झोंक

इन 60-65 साल के अंकल आंटी का झगड़ा ही ख़त्म नहीं होता…..
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एक बार के लिए मैंने सोचा अंकल और आंटी से बात करू क्यों लड़ते हैं, हर वक़्त आख़िर बात क्या है….. 
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फिर सोचा मुझे क्या मैं तो यहाँ दो दिन के लिए आया हूँ …..
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मगर थोड़ी देर बाद आंटी की जोर-जोर से बड़बड़ाने की आवाज़ें आयी तो मुझसे रहा नहीं गया …..
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ग्राउंड फ्लोर पर गया मैं तो देखा अंकल हाथ में वाइपर और पोछा लिए खड़े थे …..
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मुझे देखकर मुस्कराये और फिर फर्श की सफाई में लग गए…..
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अंदर किचन से आंटी के बड़बड़ाने की आवाज़ें अब भी रही थी…..
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कितनी बार मना किया है ….. फर्श की धुलाई मत करो….. पर नहीं मानता बुड्ढा…..
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मैंने पूछा अंकल क्यों करते हैं आप फर्श की धुलाई जब आंटी मना करती हैं तो”…….
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अंकल बोले ” बेटा, फर्श धोने का शौक मुझे नहीं इसे है। मैं तो इसीलिए करता हूं ताकि इसे न करना पड़े। 
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ये सुबह उठकर ही फर्श धोने लगेगी इसलिए इसके उठने से पहले ही मै धो देता हूं…..
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क्या…..मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।
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अंदर जाकर देखा आंटी किचन में थीं।” अब इस उम्र में बुढ़ऊ की हड्डी पसली कुछ हो गई तो क्या होगा। मुझसे नहीं होगी खिदमत।”आंटी झुंझला रही थीं।
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परांठे बना कर आंटी सिल बट्टे से चटनी पीसने लगीं…….
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मैंने पूछा “आंटी मिक्सी है तो फिर…..” 
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“तेरे अंकल को बड़ी पसंद है सिल बट्टे की पिसी चटनी। बड़े शौक से खाते हैं। दिखाते यही हैं कि उन्हें पसंद नहीं।”
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उधर अंकल भी नहा धो कर फ़्री हो गए थे। उनकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी,” 
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बेटा, इस बुढ़िया से पूछ रोज़ाना मेरे सैंडल कहां छिपा देती है, मैं ढूंढ़ता हूं और इसको बड़ा मज़ा आता है मुझे ऐसे देखकर।” 
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मैंने आंटी को देखा वो कप में चाय उड़ेलते हुए मुस्कुराईं और बोलीं, 
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“हां मैं ही छिपाती हूं सैंडल, ताकि सर्दी में ये जूते पहनकर ही बाहर जाएं, देखा नहीं कैसे उंगलियां सूज जाती हैं इनकी।
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“हम तीनो साथ में नाश्ता करने लगे ……. इस नोक झोंक के पीछे छिपे प्यार को देख कर मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था।
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नाश्ते के दौरान भी बहस चली दोनों की।
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अंकल बोले …. “थैला दे दो मुझे , सब्ज़ी ले आऊं”…… 
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“नहीं कोई ज़रूरत नहीं, थैला भर भर कर सड़ी गली सब्ज़ी लाने की”। आंटी गुस्से से बोलीं। 
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अब क्या हुआ आंटी ……. मैंने आंटी की ओर सवालिया नज़रों से देखा, और उनके पीछे-पीछे किचन में आ गया।….
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“दो कदम चलने मे सांस फूल जाती है इनकी, थैला भर सब्ज़ी लाने की जान है क्या इनमें…..
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बहादुर से कह दिया है वह भेज देगा सब्ज़ी वाले को।”
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” मॉर्निंग वॉक का शौक चर्राया है बुढ़‌ऊ को”…… तू पूछ उनसे क्यों नहीं ले जाते मुझे भी साथ में। 
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चुपके से चोरों की तरह क्यों निकल जाते हैं…. “आंटी ने जोर से मुझसे कहा।

“मुझे मज़ा आता है इसीलिए जाता हूं अकेले।”….. अंकल ने भी जोर से जवाब दिया ।
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अब मैं ड्राइंग रूम मे था, अंकल धीरे से बोले ….., रात में नींद नहीं आती तेरी आंटी को , सुबह ही आंख लगती है कैसे जगा दूं चैन की गहरी नींद से इसे ।”इसीलिए चला जाता हूं गेट बाहर से बंद कर के।”
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इस नोक झोंक पर मुस्कराता मे वापिस फर्स्ट फ्लोर पे आ गया….. 
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कुछ देर बाद बालकनी से देखा अंकल आंटी के पीछे दौड़ रहे हैं।….. 
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“अरे कहां भागी जा रही हो मेरे स्कूटर की चाबी ले कर….. इधर दो चाबी।”
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“हां नज़र आता नहीं पर स्कूटर चलाएंगे। कोई ज़रूरत नहीं। ओला कैब कर लेंगे हम।” आंटी चिल्ला रही थीं।
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“ओला कैब वाला किडनैप कर लेगा तुझे बुढ़िया।”।
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“हां कर ले, तुम्हें तो सुकून हो जाएगा।”
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अंकल और आंटी की ये बेहिसाब नोंक-झोंक तो कभी ख़त्म नहीं होने वाली थी…..
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मगर मैंने आज समझा था कि इस तकरार के पीछे छिपी थी इनकी एक दूसरे के लिए बेशुमार मोहब्बत और फ़िक्र……
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मैंने आज समझा था कि प्यार वो नहीं जो कोई “कर” रहा है …… प्यार वो है जो कोई “निभा” रहा है …..

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